गणेश पूजा स्तोत्र व श्लोक
गणेश की प्रति दिन पूजा करने से विघ्न तथा समस्याओं से मुक्ति प्रदान करेंगे | ऐसा हम सब का विश्वास है | मैं भी रोज़ पूजा के समय गणेश जी का स्मरण करते हुए निम्न दिए गए स्तोत्र पठन करता हूँ |
बुधवार का दिन गणेश जी का माना जाता है | अतः उस दिन मैं गणेश भजन भी करता हूँ |
भजन में गणेश जी का नाम जप करता हूँ |
ॐ ग़म गणपतये नमः | इसी को ११, २१, या १०८ बार जाप कर सकते हैं |
गणेश श्लोक
प्रसन्न वदनम् , ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये || (१ )
तात्पर्य :-
श्वेत वस्त्र पहने हुए सर्वत्र विराजमान , चांदिनी जैसी रूप वाला , चार भुजाएँ धारण कर, प्रसन्न मुख़ रहने वाले , सकल विघ्न या रुकावटों को भगाने वाले गणेश की स्मरण करता हूँ |
गणेश स्तोत्र
ओम श्री विघ्नेश्वराय नमः
ओम श्री विनायकाय नमः
ओम श्री एकदन्ताय नमःओम श्री गजाननाय नमः
ओम श्री गणेशाय नमः (१ )
वक्रतुण्डं महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः |
निर्विघ्नम् कुरुमेदेव सर्व कार्येषु सर्वदा || (२ )
तात्पर्य :-
घुमावदार सूंड (हाथी का सूंड ), तथा विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूरज के प्रकाश वाले हे गणेश ! हर वक्त हमारे कामों में उत्पन्न होने वाले व्यवधान व बाधाओं को हटाते रहने की विनती करता हूँ |
यहाँ पर एक और बात ध्यान देना होगा | "वक्र तुण्ड" का अर्थ एक और भी है |
वक्रों को तुण्ड करने वाला | गणेश भगवान वक्रों को यानी विकृत बुद्धियों को तोड़ने वाले हैं |
विकृत या दुष्ट शक्तियों को दण्डित कर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं |
गजवक्त्रम, सुर श्रेष्ठम, कर्ण चामर भूषितम,
पाशांकुश धरम देवम , वन्देहम गण नायकम || (३ )
तात्पर्य :-
हाथी के दाँत पा कर, देवताओं में श्रेष्ट होने वाले गणेश ! चामरों जैसी बड़े कानों से सुसज्जित , तथा पाश और अंकुश धारण करने वाले हे गण नायक! आपको सदैव प्रणाम |
विघ्नेश्वराय, वरदाय, सुरप्रियाय,
लम्बोदराय, सकलाय, जगतजिताय |
नागाननाय, श्रुतियज्ञ विभूषिताय,
गौरीसुताय, गण नाथ नमो नमस्ते || (४ )
लम्बोदराय, सकलाय, जगतजिताय |
नागाननाय, श्रुतियज्ञ विभूषिताय,
गौरीसुताय, गण नाथ नमो नमस्ते || (४ )
तात्पर्य :-
हे विघ्नों के ईश्वर , वर देने वाले प्रभू ! आप देवताओं के प्रिय हैं , लम्बे उदर वाले हैं , सब कुछ आपके अधीन है, जगत को जिताने वाले हैं , सांप जैसी हाथी के मुख वाले , सभी शास्त्र तथा यज्ञों के विशारद व आभूषण हैं आप , हे माता गौरी के पुत्र , गणों के देव , मेरे प्रणाम स्वीकार करें |
अगजानन पद्मारकम , गजाननम , अहर्निशम |
अनेक दन्तं भक्तानाम, एक दन्तं उपास्महे || (५ )
तात्पर्य :-
माता गौरी के मुखमण्डल से उभरते हुए किरणों से प्रकाशित हे गजानन ! आप दिन-रात अनेक दांतो वाले भक्त जनों की रक्षा में लगे रहते हैं | हे एक दन्त ! मैं आप ही को पूजता हूँ |

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